शनिवार, 19 नवंबर 2016

नहीं होते

यूँ तो लिखते बहुत हैं शेर सब सच्चे नहीं होते
जो बाहर से भले दिखते हैं सब अच्छे नहीं होते।।

जो लिखते हैं सियाही से मोहब्बत की इबारत को
कुछ एक शायर भी होते हैं सभी बच्चे नहीं होते।।

मोहब्बत तो मोहब्बत है किसी से हो ही जाती है
पर उसके नाम के लिख्खे कहीं पर्चे नहीं होते।।

पिता जो भी है लाता घर में मेहनत की कमाई से
वो बच्चों पर लुटाता खुद पे कुछ खर्चे नहीं होते।।

वफादारी का होता कत्ल है गंदी सियासत में
कि कुर्सी की लड़ाई में कोई अपने नहीं होते।।

जीवन का यही तो अर्थ है ये ही तो मतलब है
खुशी की रात भी आती है केवल गम नहीं होते।।

ये महफिल मौत की है एक ना एक दिन आओगे 'आखिर'
अमीरी और गरीबी के यहाँ चर्चे नहीं होते।।

।।आखिर।।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

खुद को खोज रहा हूँ कब से महफिल में वीराने में

खुद को खोज रहा हूँ कब से महफिल में वीराने में
मिला नहीं मैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा मैखाने में।।

मैं था नदियों सा चंचल मैं झरनों की झर्राहट था
मुझको बांध दिया झीलों सा जीवन की कड़वाहट ने।।

प्यार लुटाता था सब पर बस प्यार की बातें करता था
द्वेष द्वंद और घृणा समा दी इस दिल में घबराहट ने।।

इंसान था मैं शायद पहले सबकी बातें करता था
बाँट लिया है मैंने खुद को मंदिर और मजा़रों में।।

काट रहे हम एक दूजे को बस मजहब के नामों में
बहते देखीं खून की नदियाँ झूठी शान बचाने में।।

ईमान ही मेरा मजहब था रिश्तों-नातों के साए में
छूट गए हैं सब पीछे शोहरत की अंधी चाहत में।।

प्यार मैं करता था खुद से खुद को आगे मैं रखता था
भूल गया हूँ मैं खुद को इक उस चेहरे की चाहत में।।

।।आखिर।।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

कुछ बातें

आईए जिंदगी से कुछ बातें करते हैं
औरों से ना सही खुद से ही मुलाकातें करते हैं।

जो कट रही है भाग-दौड़ में वो ज़िंदगी कहाँ
जरा खुद से मिलकर अब जीने की साजिश करते हैं।

वो जिन्होंने हमें चलना सिखाया था अब थक गए हैं
वक्त रहते उन कदमों की मालिश करते हैं।

रिश्ते, नाते, वफा, मोहब्बत खो गए हैं कहीं
खुद को भूल कर इन्हें पाने की ख्वाहिश करते हैं।

वो जो चलते-चलते गिर जाता है रास्तों पर भूखा है
उन्हें कुछ खिलाकर अपना जीना सार्थक करते हैं।

वो जो राह चलते भीख मांगते हैं निरीह से बच्चे हैं
अब उनका कल संवारने की कोशिश करते हैं।

हम मोहब्बत करते हैं जिनसे वो ही हमसे रूठे बैठे हैं
आईए उन्हें मनाने की सिफारिश करते हैं।

ना एेसी हरकतें की तो भी एक दिन मरना है 'आखिर'
चलो आओ कुछ अच्छा कर कफन की ओर चलते हैं।
आइए जिन्दगी से कुछ बातें करते हैं।।

।।आखिर।।

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

बेबसी

बस कर ऐ जिन्दगी और कितने इम्तिहान लेगी मेरा
थक गया हूँ मैं इस शगुफ्ता मुखौटे को ओढ़ कर।

ना जाने कब जा कर पूरी होंगी हसरतें हमारी
हो गया हूँ चूर तेरे रास्तों पर दौड़-दौड़ कर।

मैं जब भी मुस्कुराता हूँ किसी भी मोड़ पर आकर
तू मिलती है मुझे अगले कदम गमों को ओढ़ कर।

मोहब्बत करते हैं जिनसे तू उनसे दूर करती है
कि पथरा जातीं हैं आँखें इक उनका रस्ता देख कर।

अभी जिन्दा हूँ मैं तो तू मुझे हँसने तो दे आखिर
कि कल सो जाउंगा दो गज़ कफन को अपने ओढ़ कर।

ना मिलना होगा फिर और फिर ना उनसे बातें ही होंगी
अभी सो जाने दे संग उनकी बाँहों को ही ओढ़ कर।

।।आखिर।।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

जिन्दगी का आज मैं कलाम लिखता हूँ

जिन्दगी का आज मैं कलाम लिखता हूँ
ये जिन्दगी मैं उनके नाम लिखता हूँ।।

वो जिनकी याद हमें हर कहीं तन्हा कर जाती है
मैं इन हथेलियों पर उन्हीं का नाम लिखता हूँ।।

उनकी खूबसूरती को बयान मैं करूँ तो कैसे
बस उन्हें देखकर ये सुबहों-शाम लिखता हूँ।।

जब कभी मिलता हूँ उनसे गालिब हो जाता हूँ
वो शाम मैं बस शायरी के नाम लिखता हूँ।।

हर सुबह  जब भी इबादत करने को वजू करता हूँ
यकीन मानो दुआ में सिर्फ उनका नाम लिखता हूँ।।

बिताता हूँ कभी जब रात मैं उनके तसव्वुर में
मै सुबह को बस उनकी याद पर इल्जाम लिखता हूँ।।

वो दिन भी आएगा बाहों में मेरे होंगे वो 'आखिर'
मैं तब तक अपने ख्वाबों को भी उनके नाम लिखता हूँ।।

।।आखिर।।

रविवार, 28 अगस्त 2016

खुदगर्ज

बड़ा खुदगर्ज सा मैं हो गया हूँ इश्क में शायद
कि अपनी ज़िद की खातिर मैंने उनका दिल दुखाया है।।

जो हर पल चाहते थे मेरे हँसने का सबब बनना
उन्ही को मैने अपनी हरकतों से अब रुलाया है।।

वो मुझको माफ कर देगा ये मैं जानता हूँ पर
मैं खुद को माफ ना कर पाउंगा ये सच बताया है।।

नज़र अब मैं मिला ना पाउंगा उससे कभी शायद
कि मैंने खुद को अपनी नज़रों में कुछ यूँ गिराया है।।

मुझे मालूम है वो जा रहा है दूर अब "आखिर"
उसे किस हक से रोकूं मैने जिसको कल रुलाया है।।

।।आखिर।।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

क्या कहें कि देश आजाद है

क्या कहें कि देश आजाद है
यूँ लगता है जैसे कोई खिताब है।

जो जीता था हमने कभी और रख दिया ताख पर
और ये मान बैठे कि देश अपना आबाद है।।

हम आजाद हुए तो थे पर सिर्फ अंग्रेजों से
पर अब भी कई बेड़ियों में जकड़ा हुआ भारत आज है।।

ये बेड़ियाँ हैं मज़हब में अंधे इंसान की
हर मोड़ पर टूट कर बिखरे हुए ईमान की
जाति की धर्म की संप्रदाय की
और इनमें झुलस कर जलते हुए हिंदुस्तान की
जिनमें उलझकर हम भूल गए हैं इंसानियत अपनी
जाने कहाँ छुपकर बैठा इंसान आज है।।

ये बेड़ियाँ हैं भूख से बिलखते बच्चों की
कर्ज मे डूबे हुए किसान की
जहाँ आज भी छत नसीब नहीं है लोगों को
ऐसे पिछड़े और भूखे हिंदुस्तान की।

विडंबना यह है कि हर साल हम इस जीत के जश्न को मनाते हैं
पर अपने समाज के इन शैतानों को मारना भूल जाते हैं।

हमारी इंसानियत भी जागती है दूसरों की गलतियों पर
अपनी गलती को तो हम नज़रअंदाज़ करना जानते हैं।।

ऐसी अवस्था में कैसे कहें की हम आजाद हैं
कई बेड़ियों में जकड़ा हुआ भारत आज है।।

।।आखिर।।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

निगाहें

निगाहें मस्त हैं मदहोश हैं ये दिलफरेबी हैं
भला कैसे बचें इससे हमें कोई तो समझाए।

ये काली-काली हैं घनघोर सावन की घटा जैसे
नहीं मालूम हमको है ये जाने कब बरस जाएँ।

ये तो आईना उनके दिल की हर एक ख्वाहिशों का है
ये हर वो बात कहतीं हैं जिन्हें लब कह नहीं पाए।

मैं इनको जब भी देखूँ बस इन्हीं में खो सा जाता हूँ
न जाने क्या कशिश इनमें है जो दिल बहकता जाए।

ना ये पर्दा ही करतीं हैं ना ये चिलमन से डरतीं हैं
ज़रा गुस्ताख हैं ना जाने कब ये कत्ल कर जाए।

इन्हें पाने की हसरत में मैं सब कुछ भूल बैठा हूँ
कि अपना नाम, मक़सद और पता मैं भूल बैठा हूँ
ना जाने कैसा जादू है इन मासूं सी आँखों में
इन्हें ही सोचता हूँ और ज़माना भूल बैठा हूँ
मुझे काफिर बना कर रख दिया है क्या करूँ 'आखिर'
मुझे हरसूं है दिखता वो खुदा को भूल बैठा हूँ
मुझे अब तो फकत ये खौफ हर पल ही सताता है
कहीं मैं खो ना दूं खुद को, वो आकर मुझमें बस जाए।।

।।आखिर।।

रविवार, 19 जून 2016

सलामत रहे - पिता विशेष

जिसने जन्म दिया है हमें जिसने जीना सिखाया हमें
बेटे की दुआ बस यही उसका वालिद सलामत रहे।।

इतने एहसान हैं ऐ-खुदा!  शब्दों में व्यक्त कैसे करूँ
बस तह-ए-दिल से चाहूँ यही के वो इंसान सलामत रहे।।

जिनकी गोद में सोया था मैं कांधे पर बैठ घूमा शहर
जिसने चलना सिखाया मुझे हाँ वो इंसान सलामत रहे।।

चलते-चलते कभी जब गिरा तुमने उठना सिखाया मुझे
ठोकरों से बचाया मुझे और संभलना सिखाया मुझे।।

डाँटा पुचकारा प्यार किया हर तरह से सिखाया मुझे
जिसने लायक बनाया मुझे बस वो इंसान सलामत रहे।।

जब भी रोया किसी बात पर जब कभी मैं बीमार पड़ा
रातें जग-जग के देखा मुझे वो फरिश्ता सलामत रहे।।

पढ़ना तो था मुझे जाने क्यों ख्वाहिशें उसने कुर्बान की
जिसने काबिल बनाया मुझे वो खुदा बस सलामत रहे।।

ड़रता हूँ बस इसी बात से दिल ना उनका दुखा दूँ कहीं
या खुदा मौत देना मुझे गर कोई काम ऐसा करूँ।।

इतनी रहमत दे मुझको खुदा उनको हर एक खुशी दे सकूं
मेरी जब भी जरूरत पड़े पास मे ही खड़ा मैं रहूँ।।

बोलता हूँ नहीं कुछ मगर तुझको मालूम है सच सभी
मेरे दिल में जो उनके लिए है जो इज्जत सलामत रहे।।

।।आखिर।।

बुधवार, 25 मई 2016

ना जाने किस आग ने हमें जिंदा रखा है।

धुआँ-धुआँ सी सांसें हैं बुझे-बुझे से इस मन में
ना जाने किस आग ने हमें जिंदा रखा है।।

ना अब हँसता हूँ खुलकर मैं और ना रो ही पाता हूँ
यूँ लगता है जैसे पिंजरे में कैद कोई परिंदा रखा है।।

कई ख्वाहिशें पूरी की हैं कई मकाम पा लिए है मगर
एक हसरत ने हमें आज तक शर्मिंदा रखा है।।

एक तेरे बगैर क्या रखा है इस दुनियां में
बस झूठी शोहरतों का पुलिंदा रखा है।।

और इन सब के बीच निर्लज्ज से जी रहे हैं हम
ना जाने किस आग ने हमें जिंदा रखा है।।

।। आखिर।।

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

तन्हाई में चुप चाप रहना अच्छा लगता है
ख़ामोशी से एक दर्द सहना अच्छा लगता है
वो जिनकी याद हमे हर कहीं तनहा कर जाती है
सामने उसके कुछ न कहना अच्छा लगता है ।

मिलकर उससे बिछड़ न जाएँ कहीं , डरते है
इसीलिए बस दूर ही रहना अच्छा लगता है
जी चाहे हर खुशियाँ लाकर देदूं उसे
उसके प्यार में सब कुछ करना अच्छा लगता है
उसका मिलना न मिलना . किस्मत की बात है
पर हर पल उसकी याद में रहना अच्छा लगता है ।।

।।आखिर।।

शनिवार, 26 मार्च 2016

विडंबना

ना मंदिर में वो मूरत है ना अब ऐसी विचारें हैं
सिखाये प्यार इंसान को कहां ऐसी मजा़रें हैं।।

खुले मंदिर खुले मस्जिद भला दिखते कहा हैं अब
बताओ वो कहाँ जाएंगें जो बेघर बेचारे हैं।।

खुराफाती हुए हैं लोग इस तरह कि क्या बोलूँ
कि बकरे हो गए मुस्लिम फकत हिंदू की गाएं हैं।।

फक्र था हमको तब जिस एकता का हिंद की अपनी
उसी में खुद लगाने सेंध हम सज-धज के आए हैं।।

बिगड़ेगा हमारा क्या बुरा कोई बाहरी दुश्मन
हम आपस में ही लड़कर अपना ही घर फूंक आए हैं।।

बना रखा है कैसा हमने मिलकर देश का आलम
कि आँखों से छलकता खौफ है सहमे से साए हैं।।

यूँ ही चलता रहा तो कैसे हम जी पाएंगे 'आखिर'
बड़ी उम्मीद लेकर हम भी तो दुनिया में आए हैं।।

।।आखिर।।

सोमवार, 21 मार्च 2016

जरा सा प्यार करना है

जरा सा प्यार करना है जरा सा चाहना उसको
खुदा कुछ ऐसा कर कि मुझसे आकर के वो मिल जाए।

जो बरसों से थी मुरझाई हुई ये प्यार की बगिया
मोहब्बत के गुलाबों का इतर वो इसमें भर जाए।।

मैं बंजारा सा हूँ आवारगी फितरत मेरी लेकिन
खुदा कुछ ऐसा हो मैं सादगी से उसके बंध जाऊँ।।

जो फिरता रहता था मैं प्यार की ख्वाहिश लिए दर-दर
फंसा मझधार में था मैं किनारा मुझसे मिल जाए।।

कि उसकी आँखें उसके बाल सुर्ख होठों की लाली
कोई कैसे बचे आखिर दिवाना सबको कर जाए।।

वो यूँ आए मेरे जीवन में जैसे चाँद तारों में
कि उसकी चाँदनी में मैं ज़रा फीका सा पड़ जाऊँ।।

मैं उसको बैठ कर देखूँ मैं उसको हर पहर सोचूँ
मैं उसको इस कदर चाहूँ कि मैं अफसाना बन जाऊँ।।

मेरा ये प्यार उसका है मैं बस उसके लिए 'आखिर'
मुकम्मल ऐसे हो कि ये मेरी पहचान बन जाए।।

मेरा ये नाम छोटा है मगर हसरत बड़ी ये कि
मेरे नाम की मेंहदी बस उसके हाथ जच जाए।।

।।आखिर।।

रविवार, 20 मार्च 2016

हिंदुस्तान-एक परिचय

इन्सान है जिंदा जहाँ ईमान रहता है
हिन्दू वहाँ रहता है मुसलमान रहता है।।

बनते जहाँ यमुना के तीरे ताज-ए-मोहब्बत
वहाँ सिर्फ भाईचारे का पैगाम रहता है।।

खुशियाँ क्यों ना छलकें यहाँ शाम और सहल
मनती दिवाली है कभी रमज़ान रहता है।।

तुम कहते हो हम हैं जुदा एक-दूसरे से फिर
करवा में क्यों और ईद में क्यों चाँद रहता है।।

चाहे दिलों में ख्वाजा जी हों या हो राम जी
पर खून अपना ये वतन के नाम रहता है।।

॥आखिर॥

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

लोकतंत्र ही आफत है २

इतने सुंदर देश की लोगों ने कर दी क्या हालत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

आओ गाली दें दूजे को क्योंकि हम आज़ाद हैं
आओ काटें एक दूजे को क्योंकि हम आज़ाद हैं
आओ मिलकर फूंक दें सारी गलियों की आबादी को
आओ तोड़ें भारत माँ को क्योंकि हम आज़ाद हैं
लोकतंत्र में आज़ादी हसरत थी अब ये आफत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

यहाँ मिली मुझको आज़ादी के मैं खुलकर बोल सकूं
डरूं नहीं मैं किसी तंत्र से राज़-ए-दिल मैं खोल सकूं
पर इसका क्या ये मतलब है कि 'माँ' तुझको गाली दूं
तुझको छलनी किया था उन अफज़ल-कसाब को ताली दूं
इन फूहड़ बातों पर भी आखिर क्यों होती सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

बापू ने था मार्ग दिखाया अपना काम बनाने का
बिना लड़े बस सत्याग्रह कर अपनी बात मनाने का
तब अंग्रेज थे अब हम खुद अपनी सरकार से लड़ते हैं
सत्याग्रह की आड़ में एक-दूजे को मारे फिरते हैं
कभी रोकते हैं सड़कों को कभी जलाते अड्डे हैं
इस तरह खुद के विकास हम ही खोदते गढ्ढे हैं
कुछ का इसमें स्वार्थ निहित है बाकी सब की आफत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

छोटे-छोटे हर मसले को ले सड़कों पर आते हैं
दूजों का नुकसान करा कर अपना काम बनाते हैं
जब ऐसे भी काम ना बनता तब समझो की पंगा है
तब मज़हब,जाती के नाम पर लोग कराते दंगा हैं
ऐसे में जाती निरीह और बेकसूर की जान है
ऐसे में बरबस बेबस सा हो जाता इंसान है
आजादी की आड़ में होती अब हिंसा की इबादत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

खोते हैं सैनिक अब भी सरहद के तूफान में
मरते हैं कर्जों में दबकर खेतिहर हिंदुस्तान में
पर हमको इनकी क्या चिंता हम तो चैन से सोए हैं
हम आरक्षण हम आज़ादी के मुद्दे में खोए हैं
और उस पर ये नीच सियासत के सेनानी बकते हैं
जिसको सुनकर कितनों के दिल खून के आँसू रोए हैं
जिनके कारण ज़िंदा हैं उनको जब भूले सियासत है
तब लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

यूँ तो शांत है देश मेरा पर जब ये देवी आती है
खो जाती है सहनशीलता जाने क्या कर जाती है
इनके आने पर कुछ खुद को बुद्धिजीवी कहते हैं
कुछ इनके स्वागत में फिर सम्मान गिराने लगते हैं
इन सब कुछ की आड़ में हो जाता है जीवन खून भरा
अब्र से गिरते हैं शोले धू-धू कर जल जाती है धरा
ये सब होता है जब-जब होती चुनाव की आहट है
तब लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

।।आखिर।।

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

जमाने की हर बात को हम हँस कर उड़ा देते हैं
यूँ हम अपने जीने का माहौल बना लेते हैं।।

गुस्ताखियाँ बहुत करती है जिंदगी मगर
हम उसकी हर गलती को अपना बना लेते हैं।।

तेरा मजहब मेरे मजहब से अलग है तो क्या
जब कभी मिलता है सीने से लगा लेते हैं।।

हमें तो प्यार से जीने की है आदत "आखिर"
हम नहीं लड़ते हमें नेता लड़ा देते हैं।।

।।आखिर।।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

जिंदगी के गमों को कुछ ऐसे धो देते हैं
जब कभी खुश होते हैं रो देते हैं।।

ना पूछो कैसे बिताते हैं लम्हे उनके बगैर
जब उनकी याद आती है सो लेते हैं।।
।।आखिर।।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

खुशनसीब हुँ।।

खुशनसीब हुँ शहीद हुआ सरहद पर
पर मेरी मौत को तुम ऐसे तो रुसवा ना करो।

ढूंढना बंद करो मेरे नाम में मजहब
मेरी मैयत पे तो तुम ऐसे सियासत ना करो।

नहीं है शौख मिले कोई पुरस्कार मुझे
ध्यान रखना मेरे घर में कभी आँसू ना गिरे।

कभी लौटाए ना पदक कोई मेरी खातिर
देखना देश मेरा ये असहिष्णु ना बने।।

मैं तो मर ही गया पर एक है ख्वाहिश "आखिर"
मेरे जैसा नहीं अगली दफा कोई भी मरे।।

।।आखिर।।

शनिवार, 2 जनवरी 2016

हम तेरी मोहब्बत में महसूस ये करते हैं।

हम तेरी मोहब्बत में महसूस ये करते हैं
थे जिंदा अभी तक हम अब जिंदगी जीते हैं।।

ना जाने इन आँखों ने क्या जादू किया हम पर
हम भूल गए खुद को बस याद तू रहती है।।

हर रात तू आती है ख्वाबों में मेरे ऐसे
जैसे कोई शहज़ादी चंदा से उतरती है।।

ना जाने हुआ क्या है जब से हूँ मिला तुमसे
अब आप ही सर मेरा तेरे सजदे में झुकता है।।

तेरे प्यार ऐ साहिब ना जाने क्या जादू है
मेरी गज़लों में अब बरबस तेरा रूप झलकता है।।

जब से तुम्हें देखा है इन आँखों ने ऐ जानम
तब से इन आँखों को कोई और ना जचता है।।

ना जाने हुआ क्या है मेरी ख्वाहिशों को "आखिर"
तेरी ख्वाहिशों के आगे चुपचाप ये रहती हैं।।

।।आखिर।।

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...