क्या कहें कि देश आजाद है
यूँ लगता है जैसे कोई खिताब है।
जो जीता था हमने कभी और रख दिया ताख पर
और ये मान बैठे कि देश अपना आबाद है।।
हम आजाद हुए तो थे पर सिर्फ अंग्रेजों से
पर अब भी कई बेड़ियों में जकड़ा हुआ भारत आज है।।
ये बेड़ियाँ हैं मज़हब में अंधे इंसान की
हर मोड़ पर टूट कर बिखरे हुए ईमान की
जाति की धर्म की संप्रदाय की
और इनमें झुलस कर जलते हुए हिंदुस्तान की
जिनमें उलझकर हम भूल गए हैं इंसानियत अपनी
जाने कहाँ छुपकर बैठा इंसान आज है।।
ये बेड़ियाँ हैं भूख से बिलखते बच्चों की
कर्ज मे डूबे हुए किसान की
जहाँ आज भी छत नसीब नहीं है लोगों को
ऐसे पिछड़े और भूखे हिंदुस्तान की।
विडंबना यह है कि हर साल हम इस जीत के जश्न को मनाते हैं
पर अपने समाज के इन शैतानों को मारना भूल जाते हैं।
हमारी इंसानियत भी जागती है दूसरों की गलतियों पर
अपनी गलती को तो हम नज़रअंदाज़ करना जानते हैं।।
ऐसी अवस्था में कैसे कहें की हम आजाद हैं
कई बेड़ियों में जकड़ा हुआ भारत आज है।।
।।आखिर।।
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