बुधवार, 20 जुलाई 2016

निगाहें

निगाहें मस्त हैं मदहोश हैं ये दिलफरेबी हैं
भला कैसे बचें इससे हमें कोई तो समझाए।

ये काली-काली हैं घनघोर सावन की घटा जैसे
नहीं मालूम हमको है ये जाने कब बरस जाएँ।

ये तो आईना उनके दिल की हर एक ख्वाहिशों का है
ये हर वो बात कहतीं हैं जिन्हें लब कह नहीं पाए।

मैं इनको जब भी देखूँ बस इन्हीं में खो सा जाता हूँ
न जाने क्या कशिश इनमें है जो दिल बहकता जाए।

ना ये पर्दा ही करतीं हैं ना ये चिलमन से डरतीं हैं
ज़रा गुस्ताख हैं ना जाने कब ये कत्ल कर जाए।

इन्हें पाने की हसरत में मैं सब कुछ भूल बैठा हूँ
कि अपना नाम, मक़सद और पता मैं भूल बैठा हूँ
ना जाने कैसा जादू है इन मासूं सी आँखों में
इन्हें ही सोचता हूँ और ज़माना भूल बैठा हूँ
मुझे काफिर बना कर रख दिया है क्या करूँ 'आखिर'
मुझे हरसूं है दिखता वो खुदा को भूल बैठा हूँ
मुझे अब तो फकत ये खौफ हर पल ही सताता है
कहीं मैं खो ना दूं खुद को, वो आकर मुझमें बस जाए।।

।।आखिर।।

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...