सोमवार, 17 मार्च 2014

मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी

एक अँधेरे में थी ये मेरी ज़िन्दगी
तुम अगर आओ तो रोशनी आएगी
पूरी की पूरी थी ये तो बिखरी हुई
तेरे आने से थोड़ी संवर जायेगी
जाने कितने ही सावन अकेले गए
भूल कर भी न रंगों को मैं छु सका
अबके फाल्गुन अगर तुम इधर आओगे
मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी ॥

मैं तो बंज़र ज़मीं सा था सूखा हुआ
तेरे आने से इसमें नमी आएगी
ठूंठ कि तरह मैं कब से तनहा खड़ा
तेरे आने से कुछ कोपलें आएँगी
बारिशों ने मुझे जाने कब था छुआ
सूखे रंगों सा मैं तनहा उड़ता रहा
गर घटा बनके अब तू बरस जायेगी
मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी ॥

आज कल रात में नींद आती नहीं
तेरे आने से सपने भी आ जायेंगे
चाँद भी बादलों में था छुपता रहा
तेरे आने से फिर चांदनी आएगी
दिल परेशां था मैं भी हैरान था
तुमको देखा तो इसमें उमंगें उठीं
सोचता हूँ अगर मुझको चाहोगे तुम
प्यास मेरी मोहब्बत कि बुझ जायेगी
गर कभी भूल कर तुम इधर आओगे
मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी ॥

                         ॥आखिर॥

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

जब से मिले हो तुम , सब बदल गया है जैसे 
कि अब जग झूठ और तेरा प्यार सच्चा लगता है 
और यूँ तो बहुत बड़बोले थे हम मगर 
अब चुप-चाप तेरे करीब रहना अच्छा लगता है ॥

और लाल पीले हरे नीले , कई रंग देखे थे हमने
पर तेरे रंग के आगे ये सब कच्चा लगता है
कि अब तक खेलते थे हम , इन रंगों में डूब कर होली
पर अब तेरे प्यार के रंग में रंगना अच्छा लगता है ॥

"आखिर"

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

है चुनाव एक बार हमे फिर अपना फ़र्ज़ निभाना है
भारत का वासी होने का एक कर्त्तव्य निभाना है
कि न पहुचे कोई चोर उचक्का संसद  के गलियारों में में
सोच समझकर प्रत्याशी को वोट डालने जाना है ॥ 

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...