गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

जब पहली बार मिले थे हम

तन्हाई का आलम था जब पहली बार मिले थे हम
रिम-झिम गिरता सावन था जब पहली बार मिले थे हम
बारिश कि बूंदों ने हम दोनों को खूब भिगाया था
यूँ भीगे-भागे , सहमे से पहली बार मिले थे हम ॥

दिल में थे जज़्बात मगर हर लम्हे में खामोशी थी
तुम भी चुप थी मैं भी चुप था जाने का मदहोशी थी
मैं तुमको जब एक टक देखूं तो तुम शरमा जाती थी
ऐसे में जब बदल गरजे तो तुम घबरा जाती थी
कैसा वो आलम था जब एक दूजे में खोये थे हम
और भूला था मैं जग को जब पहली बार मिले थे हम ॥

तुम गुलाब की पंखुड़ी जैसी मैं भवरे सा था मूरख
बाकि सब मैं भूल गया जब से देखी तेरी सूरत
पानी कि बूँदें थीं तुम पर मोती जैसी चमक रहीं
कनक कलेवर में भीगी सी खजुराहो कि तुम मूरत
काले बदल के घिरने पर , बिजली जैसी थी चमकी तुम
चकाचौंध ये आँखें थी , जब पहली बार मिले थे हम ॥

फिर तुम जाने लगी , अचानक मुझको ये एहसास हुआ
कल तक मेरा दिल था , मेरा अब वो तेरे पास हुआ
दूर गयी जब तुम तो मेरे दिल एक कसक उठी
फिर लौटी तुम , लगी गले , तो जीवन का एहसास हुआ
पुरबइया और पछिया जैसे उस सावन में साथ मिले
हुई  मोहब्बत मुझको भी यूँ अब हम पहली बार मिले ॥ 

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

तन्हाई में चुप चाप रहना अच्छा लगता है 
ख़ामोशी से एक दर्द सहना अच्छा लगता है 
वो जिनकी याद हमे हर कहीं तनहा कर जाती है 
सामने उसके कुछ न कहना अच्छा लगता है ।

मिलकर उससे बिछड़ न जाएँ कहीं , डरते है
इसीलिए बस दूर ही रहना अच्छा लगता है
जी चाहे हर खुशियाँ लाकर देदूं उसे
उसके प्यार में सब कुछ करना अच्छा लगता है
उसका मिलना न मिलना . किस्मत की बात है
पर हर पल उसकी याद में रहना अच्छा लगता है ।।

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...