बस कर ऐ जिन्दगी और कितने इम्तिहान लेगी मेरा
थक गया हूँ मैं इस शगुफ्ता मुखौटे को ओढ़ कर।
ना जाने कब जा कर पूरी होंगी हसरतें हमारी
हो गया हूँ चूर तेरे रास्तों पर दौड़-दौड़ कर।
मैं जब भी मुस्कुराता हूँ किसी भी मोड़ पर आकर
तू मिलती है मुझे अगले कदम गमों को ओढ़ कर।
मोहब्बत करते हैं जिनसे तू उनसे दूर करती है
कि पथरा जातीं हैं आँखें इक उनका रस्ता देख कर।
अभी जिन्दा हूँ मैं तो तू मुझे हँसने तो दे आखिर
कि कल सो जाउंगा दो गज़ कफन को अपने ओढ़ कर।
ना मिलना होगा फिर और फिर ना उनसे बातें ही होंगी
अभी सो जाने दे संग उनकी बाँहों को ही ओढ़ कर।
।।आखिर।।
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