जिन्दगी का आज मैं कलाम लिखता हूँ
ये जिन्दगी मैं उनके नाम लिखता हूँ।।
वो जिनकी याद हमें हर कहीं तन्हा कर जाती है
मैं इन हथेलियों पर उन्हीं का नाम लिखता हूँ।।
उनकी खूबसूरती को बयान मैं करूँ तो कैसे
बस उन्हें देखकर ये सुबहों-शाम लिखता हूँ।।
जब कभी मिलता हूँ उनसे गालिब हो जाता हूँ
वो शाम मैं बस शायरी के नाम लिखता हूँ।।
हर सुबह जब भी इबादत करने को वजू करता हूँ
यकीन मानो दुआ में सिर्फ उनका नाम लिखता हूँ।।
बिताता हूँ कभी जब रात मैं उनके तसव्वुर में
मै सुबह को बस उनकी याद पर इल्जाम लिखता हूँ।।
वो दिन भी आएगा बाहों में मेरे होंगे वो 'आखिर'
मैं तब तक अपने ख्वाबों को भी उनके नाम लिखता हूँ।।
।।आखिर।।