इस दुनिया में जीने का कुछ आधार चाहिए
दो जून की रोटी ज़रा सा प्यार चाहिए ॥
हमको नहीं है शौख महलों और दुमहलों के
एक छोटी सी कुटिया में एक परिवार चाहिए ॥
हर एक दुआ खुदा करेगा तेरी मुकम्मल
उन सब दुआ में बस तेरा ईमान चाहिए ॥
हमने बनाया था जिन्हे सद्र-ए-जम्हूरियत
वो आज हमसे पूछते है कौन चाहिए ?
कैसी रियासतें हुईं कैसी सियासतें
मजहब के नाम पर जिन्हे व्यापार चाहिए ॥
हिन्दू हूँ मैं मुस्लिम हूँ मैं ही सिख-ईसाई
तू बोल किससे मिलना है क्या काम चाहिए ॥
मज़हब से मुझे जोड़ के न देख सितमगर
इंसान हूँ इंसान सा व्यवहार चाहिए ॥
हर ओर क़त्ल-ए-आम मजहब के नाम पर
न जाने कहाँ खो गया इंसान चाहिए ॥
भटका हूँ दर-बदर यहाँ इंसान की खोज में
अब प्यास सी लगी है साकी जाम चाहिए ॥
जब पहुँचूँगा जीवन के मैं "आखिर" पड़ाव पर
एक कब्र-ए-मुक़र्रर में बस आराम चाहिए ॥
॥आखिर॥
दो जून की रोटी ज़रा सा प्यार चाहिए ॥
हमको नहीं है शौख महलों और दुमहलों के
एक छोटी सी कुटिया में एक परिवार चाहिए ॥
हर एक दुआ खुदा करेगा तेरी मुकम्मल
उन सब दुआ में बस तेरा ईमान चाहिए ॥
हमने बनाया था जिन्हे सद्र-ए-जम्हूरियत
वो आज हमसे पूछते है कौन चाहिए ?
कैसी रियासतें हुईं कैसी सियासतें
मजहब के नाम पर जिन्हे व्यापार चाहिए ॥
हिन्दू हूँ मैं मुस्लिम हूँ मैं ही सिख-ईसाई
तू बोल किससे मिलना है क्या काम चाहिए ॥
मज़हब से मुझे जोड़ के न देख सितमगर
इंसान हूँ इंसान सा व्यवहार चाहिए ॥
हर ओर क़त्ल-ए-आम मजहब के नाम पर
न जाने कहाँ खो गया इंसान चाहिए ॥
भटका हूँ दर-बदर यहाँ इंसान की खोज में
अब प्यास सी लगी है साकी जाम चाहिए ॥
जब पहुँचूँगा जीवन के मैं "आखिर" पड़ाव पर
एक कब्र-ए-मुक़र्रर में बस आराम चाहिए ॥