फिर कोई चेहरा उकर के आया है।
फिर कहीं खोया सा रहता हूँ किसी में
फिर कोई आवाज देने आया है।
फिर कहीं ग़ुम है मेरे दिल की धड़कन
फिर कोई एहसास लेकर आया है।
फिर कहीं आवारगी को भूल बैठा हूँ
फिर कोई दरिया का साहिल बन के आया है।
फिर कहीं ग़ुम है खुशी दुनिया की रंजिश में
फिर कोई अफसुर्दगी लेकर के आया है।
फिर ना जाने किसकी खातिर कत्ल हो जाऊँ
कि फिर कोई कातिल निकल कर आया है॥
॥आखिर॥