जरा सा प्यार करना है जरा सा चाहना उसको
खुदा कुछ ऐसा कर कि मुझसे आकर के वो मिल जाए।
जो बरसों से थी मुरझाई हुई ये प्यार की बगिया
मोहब्बत के गुलाबों का इतर वो इसमें भर जाए।।
मैं बंजारा सा हूँ आवारगी फितरत मेरी लेकिन
खुदा कुछ ऐसा हो मैं सादगी से उसके बंध जाऊँ।।
जो फिरता रहता था मैं प्यार की ख्वाहिश लिए दर-दर
फंसा मझधार में था मैं किनारा मुझसे मिल जाए।।
कि उसकी आँखें उसके बाल सुर्ख होठों की लाली
कोई कैसे बचे आखिर दिवाना सबको कर जाए।।
वो यूँ आए मेरे जीवन में जैसे चाँद तारों में
कि उसकी चाँदनी में मैं ज़रा फीका सा पड़ जाऊँ।।
मैं उसको बैठ कर देखूँ मैं उसको हर पहर सोचूँ
मैं उसको इस कदर चाहूँ कि मैं अफसाना बन जाऊँ।।
मेरा ये प्यार उसका है मैं बस उसके लिए 'आखिर'
मुकम्मल ऐसे हो कि ये मेरी पहचान बन जाए।।
मेरा ये नाम छोटा है मगर हसरत बड़ी ये कि
मेरे नाम की मेंहदी बस उसके हाथ जच जाए।।
।।आखिर।।
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