शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

तुझे देखूँ नहीं जब तक।

तुझे देखूँ नहीं जब तक ये दिल बेबस सा रहता है
तुझे जब देख लेता हूँ अजब सा चैन पाता हूँ।।

झुक जाता है तुझको देख कर सजदे में सर मेरा
तेरी हर एक झलक में मैं खुदा का नूर पाता हूँ।

ना जाने क्या कशिश है तेरी आँखों में मेरे हमदम
मैं खुद-ब-खुद तेरी आगोश में खिचता सा आता हूँ।।

समंदर की लहर सा ही हिलोरे मैं भी लेता हूँ
तेरे धीरज से टकराकर मचलना भूल जाता हूँ।।

ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी मेरी
चले आओ कि तुम बिन मैं इसे सूना सा पाता हूँ।।

गुजर जाती है रातों को कुछ ऐसे जिन्दगी अपनी
बहुत सी यादें रहती हैं जरा सी नींद पाता हूँ ।।

ये कैसी हसरतें हैं और कैसी ख्वाहिशें "आखिर"
मै अपनी हर दुआओं में फकत तुझको ही पाता हूँ।।

।।आखिर।।

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...