गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

JANMDIN....:)...:(

जन्मदिन


सोंचता था हूँ ज़रा शरीफ
नहीं होगी इतनी तकलीफ
पर ये भ्रम मेरा तोडा
सब ने मुझे ऐसा फोड़ा
फितरत थी उनकी कुछ अजीब
बचा न पाया मैं अपनी तशरीफ़
अब न उठता हु न बैठता हूँ
ऐसे ही घूमता हूँ
हर पल एक दर्द महसूस करता हूँ
जब उस रात को याद करता हूँ
जब मनाया था मैंने
अपने जन्मदिन का त्यौहार
हॉस्टल में पहली बार |
जब धोया था लोगों ने मुझे समझ के बेकार
याद आते ही हो जाता हु मैं बेक़रार
भगवान् न करे
दुबारा आये ये जन्मदिन का त्यौहार
न सोमवार न शुक्रवार न रविवार
क्यूंकि जब बी आएगा
तो कराएगा मुझे एक दर्द का एहसास
जिससे झूझते हुए
न जाने कैसे बीती थी वो सुहानी रात |||

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

my latest one...Enhanced by Smiley Central
हर शाम तन्हाई में किसी का इंतज़ार है
इन खुश्क से होटों पे न जाने कैसी प्यास है
चाहत यही के राज़ेबयाँ कर दूँ मैं दिल का
पर नज़रों को पढना भी प्यार है ||

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...