रविवार, 15 दिसंबर 2013

याद आते हैं

आँखों में ख्वाब पाले घर से निकल पड़े थे
मंजिल का तो गुमां था राहों से बेखबर थे
था दौर एक नया वो मौसम नए नए थे
जब पहली बार यारों कॉलेज में हम मिले थे ॥

वो होस्टल कि मेस में खाने के लिए जाना
लाइन से दूर हट कर वो पूरियां चुराना
खाने की सीट पर मिल के , किसी एक को सताना
याद आता है हमेशा वो गुजरा हुआ ज़माना ॥

रातों में देर सो कर , सुबहों को देर जगना
पहली क्लास में तो हर दिन ही लेट जाना
बाकी कि क्लास बंक करने को नेतागिरी करना
याद आता है हमेशा आपस में वो झगड़ना ॥

एक दिन किसी काली से फिर आँखें चार करना
उसके करीब रहने के हर एक जुगाड़ करना
टेक-फेस्ट के बहाने उस संग दो पल बिताना
याद आता है हमेशा यारों को यूँ जलना ॥

Exam से जियादा , कम attendence से डरना
मिलकर लिखे assignment को आखिर में जमा करना
आखिर के दो दिनों में पांचों यूनिट को पढ़ना
याद आता है हमेशा वो ले-दे के पास करना ॥

चौथा जो साल आया तो, होश सबके ही उड़े थे
अब तक जो careless थे वो sincere हुए थे
होता भी क्यूँ न ऐसा मंजिल पे जो खड़े थे
सबकी निगाहों में अब बस प्लेसमेंट्स बसे थे
बालों को फिर कटा के वो फॉर्मल्स पहनना
याद आता है अभी भी इंसान सा वो दिखना ॥

कितने हसीं वो दिन थे कितनी हंसीं थी रातें
चाहे ख़ुशी या गम हो मिलकर थे हुने बांटे
आंसूं भरी निगाहें ले सबका वो बिछड़ना
भूलेंगे ना कभी भी हम जब तक रहेंगे ज़िंदा ॥ 

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

हसने मुस्कुराने की आदत अभी बाकी है
सूनेपन में उसके आने की सरसराहट अभी बाकि है
अभी से क्या बताएं हम कहानी अपनी
ज़िन्दगी जीने के चाहत अभी बाकी हैं ।।

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

वो कभी फुरसत में नहीं मिलता मुझे
जब भी  मिलता है कुछ काम होता है
बेवफा कहूँ या जालिम उसे , "आखिर"
प्यार तो अपना ही बदनाम होता है ||

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

भूल गए है लोग

ज़िन्दगी को अपनी भूल गए है लोग
बंदगी को अपनी भूल गए है लोग
जो खेलते थे कभी गाँव की इन गलियों में
आज शहरों में जाकर डूब गए है लोग
भूल गए है लोग ॥

सदियों पुराणी संस्कृति को
वो दुर्गा और उस पारवती को
जिसको हम सदियों से पूजते थे
आज उनसे क्यूँ दूर गए है लोग ?
कुछ तो है जिसे
भूल गए है लोग ॥

जिनके आने से घर में खुशियां आती थी
जो इस दुनियां की जननी कहलाती थी
पर आज न जाने क्यूँ
उन्हें ही आने से रोक रहे है लोग ?
लगता है उनका महत्त्व
भूल गए है लोग ॥

आज जहाँ देखो वहां एक दुखियारी है
क्यूँ ज़िन्दगी की हर दौड़ में पिसती सिर्फ नारी है ?
हर मोड़ हर चौराहे खड़े बस हवस के पुजारी है
जिससे होकर गुजरना हर नारी की लाचारी है
क्यूँ उत्तेजना में इतने निर्लज्ज हुए है लोग ?
लज्जा आती नहीं इन्हें या क्या होती है ?
भूल गए है लोग ॥

क्या हो गया है लोगों को
ये कैसी विकृत छाई है
पहले औरत , फिर लड़कियां और
अब तो बच्ची भी नहीं बच पाई है
और विडम्बना यही है की
मानव जन्म लेकर भी , जानवरों की तरह हो गए है लोग
लगता है जैसे अपनी मानवता
भूल गए है लोग ॥

ये मेरा देश अपनी सभ्यता के लिए
पूरी दुनिया में विख्यात था
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम
बस इसका ही राग था
शांति और सदभाव के प्रतीक
इस देश में , हर व्यक्ति आना चाहता था
पर कुछ दिन से देश में काफी गहमा गहमी है
आये दिन अत्याचार के किस्सों से मानवता भी सहमी है
और आलम ये है की दूसरों में तो दूर
आज अपनों में भी अपनों का खौफ है
लगता है जैसे शांति से ख़ुशी से रहना
भूल गए है लोग ॥

तो ऐसा क्या हुआ आज की
लोग हमसे ही डरने लगे हैं ?
हम क्यूँ हर बात पर हर दिन
अपनी ही इज्ज़त को तार-तार करने लगे है ?
नारी की ऐसी दुर्गति इस देश को
ऐसे अन्धकार में ले जाएगी
फिर जहाँ हमे देखने
सूरज की एक किरण तक नहीं आएगी
ये सब जानते हुए भी
फिर उसी राह पर चल दिए है लोग
ऐसा लगता है , अपनी विरासत , अपनी सभ्यता
अपना देश
भूल गए है लोग ॥

                                               शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर'

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

आओ मिल कर याद करें वीरों की अमर कहानी को

भारत देश महान मेरा हर कोई दिल से गाता है
पर आज़ादी का मतलब कोई भी समझ ना पाता है
जिसके पीछे माँ ने अपने बेटों को कुर्बान किया
न जाने कितनी अबलाओं ने सुहाग का दान किया
बुझ जाये घर का चिराग झंडे की लाज बचाने को
काम आये उसका भी खून इस धरती को उपजाने को
इस आज़ादी को पाने में दी गई हर क़ुरबानी को
आओ मिल कर याद करें उन अगणित अमर कहानी को ॥

जब अंग्रेजों ने भारत में आकर धंधा खोल था
मुग़ल प्रशाशन की नीवों को उसने जमकर तोला था
घात लगा कर था बैठा मौका मिलते ही वार किया
मुग़लों से छीना गद्दी , तब से भारत पर राज़ किया
करता था शोषण हर दिन , खेतों की हरी जवानी का
धर्मभ्रस्ट करने को आतुर था , हर हिंदुस्तानी का
तब जाग ब्राह्मण एक जिसने दुष्टों का संघार किया
परशुराम सा शंखनाद कर जनशक्ति का प्रचार किया
जिसने दी सुरुआत हमे आज़ादी के पथ जाने को
आओ मिल कर याद करें "मंगल" की अमर कहानी को ॥

परुष नहीं केवल थे इसमें महिलाओं की भी टोली थी
जिसने हंस के अंग्रेजों संग खेली खून की होली थी
घर छोड़ा चूल्हा छोड़ा धरती की आन बचने को
बच्चे को कंधे पे ले वो लड़ गयी तीर कमानों से
ऐसी लड़ी मजबूर हुए वो लोहे के चने चबाने को
आओ मिल कर याद करें "लक्ष्मी" की अमर कहानी को ॥

फिर आया वो दौर की जिसमे "शेखर" ने रण खोला था
पंद्रह कोड़े खा कर भी भारत माँ की जय बोला था
एक लड़का था साथ "भगत" जिसकी आँखों में शोला था
खून का जिसके हर क़तरा बस आज़ादी ही बोल था
एक उनमे थे "हसरत" जिसने इंक़लाब का ज्ञान दिया
वन्दे मातरम कह कर "बंकिम" ने हमको अभीमान दिया
इंक़लाब के शोलों से भर एक मशाल जलने को
आओ मिल कर याद करें वीरों की अमर कहानी को ॥

फिर आई लाठी जिसने अंग्रेजों का अप्मान किया
बिना लडे ही जिसने अपनी ताकत का संज्ञान दिया
फिर सुभाष ने खून मांग आज़ादी का विश्वास दिया
भारत छोडो कहकर हमने अंग्रेजो को फांस दिया
हार मान फिर अंग्रेजों ने अपने घर को प्रस्थान किया
कैसी सुखद घडी थी जब अपने झंडे को मान मिला
देशवासियों को उस दिन आज़ादी का सम्मान मिला
तब निकले "चाचा" हमको प्रगति की रह दिखने को
आओ मिल कर याद करें वीरों की अमर कहानी को ॥

सडसठ वर्ष हुए है हम अब भी वो जश्न मानते है
आज भी हम हर पल उस आज़ादी के गीत को जाते है
जिन शब्दों ने भारत को दुनिया में एक पहचान दिया
जन गन मन कहकर "रविन्द्र" ने भारत को वह नाम दिया
जीना मरना मेरा माँ बस इन तेरे चरणों में हो
नतमस्तक हो शीश मेरा जब भी तेरा ये वंदन हो
चाहे जितनी जो खुशियाँ पर वीरों का अपमान न हो
मोल नहीं उस आज़ादी का जिसमे उनका नाम न हो
करता है 'आखिर' ये नमन आज़ादी के परवानो को
आओ मिल कर याद करें हम अपने अमर जवानों को ॥

                                                              || शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर' ||

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

सलामत रहे

ज़िन्दगी इतनी कम है तो क्यूँ इसमें गम के ठिकाने रहें 
प्यार से इसको भर लो यहाँ बस ख़ुशी के बहाने रहें ॥

जिसने पला है हमको यहाँ जिसने चला सिखाया हमें 
बेटे की बस दुआ है यही उसका वालिद सलामत रहे ॥

ऐसी तालीम दे ऐ खुदा तेरा इंसान सलामत रहे
तेरा मस्जिद सलामत रहे तेरा मंदिर सलामत रहे ॥ 

आज कुछ ऐसा कर ऐ खुदा लोग आपस में फिर न लड़ें 
हर कोई प्यार बांटें यहाँ मुल्क मेरा सलामत रहे ॥ 

हर कहीं है गरीबी यहाँ हर घडी लोग भूखे रहे 
मुल्क ऐ काश अब मेरा हो इसमें भूखा न कोई मरे ॥ 

जब तलक था अकेला मेरा महफ़िलों में बसेरा रहा 
तेरे आने से ऐसा लगा मुझको इक आशियाँ मिल गया ॥ 

प्यार तुमसे किया है तो फिर और किससे जताएंगे हम
ज़िन्दगी के हर इक मोड़ पर अपना तो आशियाना नहीं ||

प्यार का ये नशा है कहाँ मैकदों के किनारे रहे
आँखों से मैं पियून उम्र-भर मेरा साकी सलामत रहे ॥ 

प्यार की ये कहानी मेरी है वफ़ा से भरी हर कहीं 
इसमें तुम भी दुआएं भरो मेरी जोड़ी सलामत रहे ॥

जिंदा हूँ जब तेरा साथ है मर गया जब जुदा हम हुए
ज़िन्दगी के हर एक मोड़ पर अपनी हस्ती सलामत रहे ॥

कोई मज़हब न ज़ात कोई ना ही द्वेष बढ़ाये कभी 
'आखिर' जो भी लिखे लफज़ इश्क की बस इबादत करे ॥ 

सोमवार, 27 मई 2013

था एक वो रास्ता हम जिसपे चलना छोड़ आये हैं 
किसी की ख्व्हिशों पर हम मचलना छोड़ आये हैं 
की जिनमे डूब कर हम रोज़ दुनिया भूल जाते थे 
वो आँखों का  समुन्दर वो किनारा छोड़ आये हैं ॥ 

गुरुवार, 28 मार्च 2013


शगुफ्ता थे , अपनी हंसी दरकिनार कर बैठे 
किसी की याद में नींदें निसार कर बैठे 
और वो आँखें , जिन्होंने कल हमारी नींद लूटी थी 
हुए मजबूर इतने कि , उन्ही से प्यार कर बैठे ।।

गुरुवार, 21 मार्च 2013

गर हिन्दू होता तो पंडित न बनता 
गर होता जो मुसलमान तो काजी न बनता 
जो छीनी न होती तूने मुझसे मेरी ज़मीन 
ए सियासी भेडियों ,
खुदा कसम मैं आतंकवादी न बनता ।।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013



निगाहों में तेरी चाहत के नगमे यूँ भरे कबसे 
जो आयीं बारिशों की रुत तुझे सुनने को ये तरसें 
तेरी पायल की रुन-झुन जब कभी इस दिल में बजती है 
तेरे इक दर्श को आँखें मेरी कुछ यूँ तरसती है 
की आ भी जा मेरे हमदम अगर चाहत है कुछ मुझसे 
किन बिन मौसम भी ये आँखें मेरी ऐसे बरसती है 
नज़ारा देख कर के लोग बस ये बात कहते हैं 
की शम्मा आज भी कातिल है बस परवाने जलते हैं ||

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013


एक तमन्ना बस तेरी मैं यार करता हूँ 
साथ हो तू ये दुआ हर बार करता हूँ 
तू मिले तो ज़िन्दगी ये लगती है जन्नत 
वरना चाँद तारों में दीदार करता हूँ 
ज़िन्दगी में यूँ तो काफी ख्वाहिशे मुझको 
ज़िन्दगी से ज्यादा तुझको प्यार करता हूँ ||

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

जब चाँद को अपनी चांदनी का गुरूर होता है 
जब फिजाओं में ताजगी का एक अलग नूर होता है 
तब लाख बचाए दिल खुद को मगर 
ऐसे मौसम में ये प्यार ज़रूर होता है ।

शनिवार, 26 जनवरी 2013

सबसे बढ़िया ये तिरंगा है


कहीं पर्वत है कहीं गंगा है 
कहीं खुशबु कहीं पतंगा है 
देखे है हमने कई रंग
सबसे बढ़िया ये तिरंगा है ।।

हर ख्वाब बने त्यौहार यहाँ 
त्यौहार में सब संग होते हैं 
होली हो या रमजान कभी 
कभी ईद दिवाली होते है 
जब इन त्योहारों के रंग मिले
तो बनता एक ही झंडा है  
देखे है हमने कई रंग
सबसे बढ़िया ये तिरंगा है ।।

मना है जाती विभाजन पर 
हर दिन हम साथ में रहते है 
हम हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई 
सब को भाई कहते हैं 
जब इन वर्णों का रंग मिले 
तो बनता एक ही झंडा है  
देखे है हमने कई रंग
सबसे बढ़िया ये तिरंगा है ।।

है शिखर हमारे उत्तर में 
है दक्षिण में आपर जलज 
है पश्चिम में कुछ रेत मगर 
पूरब में पानी की गंगा है 
जब मौसम के सब रंग मिले  
तो बनता एक ही झंडा है  
देखे है हमने कई रंग
सबसे बढ़िया ये तिरंगा है ।।

जब इतने रंग आँचल में लिए 
लहराता देश का झंडा है 
तो क्यूँ न कहूँ सर ऊँचा कर 
ये मेरे देश का झंडा है 
देखे है हमने कई रंग
सबसे बढ़िया ये तिरंगा है ।।


--->शशांक कुमार पाण्डेय  <--- p="">

शनिवार, 19 जनवरी 2013

कैसी है तू ऐ ज़िन्दगी


मैं रोता हूँ , तू हंसाती है 
मैं हँसता हूँ , तू रुलाती है 
मैं सुनता हूँ , तू सुनती है
मैं रुकता हूँ , तू चलती है 
न जाने कैसी है  तू ऐ ज़िन्दगी 
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।

कभी तो सुन क्या हसरतें है मेरी
कभी तो कर जो फितरतें हैं मेरी  
कभी तो कह जो सुनना चाहूँ मैं 
कुछ तो कर ऐसा कि खुश हो जाऊं मैं 
पर तू हर पल मुझसे अपनी ही बात मानवाती है 
न जाने कैसी है  तू ऐ ज़िन्दगी 
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।

जो जीना चाहे उसे मौत दे जाती है 
किसी से मरते हुए दिन बितवाती  है 
कहीं खुशियों की चाँदनी बिखेरी है तूने तो  
कहीं घनघोर अन्धकार छोड़ जाती है 
न जाने कैसी है  तू ऐ ज़िन्दगी 
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।

मैं तो कवी हूँ ज़माने की बातें करता हूँ 
कभी नज़ारे तो कभी फ़साने की बातें करता हूँ 
अपनी अभिव्यक्ति से दिल-मिलाने की बात करता हूँ 
पर तू मेरी भी कलाम से अपना गुणगान करवाती है 
न जाने कैसी है  तू ऐ ज़िन्दगी 
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।

--->शशांक कुमार पाण्डेय <--- p="p">

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...