आसमान ज़रा ख्वाहिशों से उपर होता है
मोहब्बत में इंसान कहां ज़मीन पे होता है।।
जब भी सुनता हूं उसे ज़माने की खामोशी में
यूं लगता है मेरा रहनुमा यहीं पर होता है ।।
बहुत कुछ कहता हूं उनसे पर मेरी सुनता कौन है?
उनका ध्यान तो शायद और कहीं पर होता है।।
इकरार ,इजहार, इबादत,दुआ सब करता हूं मैं
मेरा यार जब मेरी सरजमीं पर होता है।।
वो पागल सी है अल्हड़ अपने अंदाज में पर अशकिम
मेरा प्यार बस उसी के लिए होता है ।।
मोहब्बत करती है वो और बताती भी है "आखिर"
की उनका समय भी बस मेरे लिए होता है ।।
।।आखिर।।