शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

होता है।

आसमान ज़रा ख्वाहिशों से उपर होता है
मोहब्बत में इंसान कहां ज़मीन पे होता है।।

जब भी सुनता हूं उसे ज़माने की खामोशी में
यूं लगता है मेरा रहनुमा यहीं पर होता है ।।

बहुत कुछ कहता हूं उनसे पर मेरी सुनता कौन है?
उनका ध्यान तो शायद और कहीं पर होता है।।

इकरार ,इजहार, इबादत,दुआ सब करता हूं मैं
मेरा यार जब मेरी सरजमीं पर होता है।।

वो पागल सी है अल्हड़ अपने अंदाज में पर अशकिम
मेरा प्यार बस उसी के लिए होता है ।।

मोहब्बत करती है वो और बताती भी है "आखिर"
की उनका समय भी बस मेरे लिए होता है ।।

।।आखिर।।

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

मिलती कहाँ है?

खरीदारी है ईमान की रवादारी मिलती कहाँ है?
ये सियासत है यहाँ वफादारी मिलती कहाँ है?

गलतियाँ हो जाती है लड़कों से सुनते हैं हम मगर
लड़कियों को यहाँ पहरेदारी मिलती कहाँ है?

जब कभी निकलतीं हैं वो सड़कों पर अपने हक की खातिर
लाठियाँ मिलती हैं उन्हें जवाबदारी मिलती कहाँ है?

कैसे किसी रिश्ते पर यकीन करें वो लोग "आखिर"
इतने वहशी माहौल में अब समझदारी मिलती कहाँ है?

।।आखिर।।

रविवार, 15 जनवरी 2017

भूल बैठे हैं।

एक उनकी ख्वाहिशों में हम जमाना भूल बैठे हैं
मोहब्बत के सफर में हम ठिकाना भूल बैठे हैं।।

जो उनके साथ बीते हैं वो लम्हे याद हैं अब भी
बिना उनके गुजारा वक्त सारा भूल बैठे हैं।।

वो आँखें थी किसी दरिया में बनते से भँवर जैसी
कि जिनमें डूब कर अपना किनारा भूल बैठे हैं।।

ना जाने कैसी थी जादूगरी पुरनूर चेहरे की
कि उनकी याद है सूरत खुदा की भूल बैठे हैं।।

मैं लिखता था बहुत कुछ और कई अंदाज थे मेरे
महज़ गजलों में सिमटे हैं कि लिखना भूल बैठे हैं ।।

क्या कम थीं आँखें और काया कि अब रूखसार का ये तिल
क्या लिखें शान में उनकी कि स्वर हम भूल बैठे हैं।।

मुकम्मल होना है एक दिन मेरा भी इश्क तो 'आखिर'
मेरे हर अक्स में वो हैं कि खुद को भूल बैठे हैं।।

।।आखिर।।

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...