क्या कहूँ कि आलम यहाँ क्या होगा
सब तो होंगे मगर तू नहीं होगा ॥
ये रियासतें तो यहीं होंगीं मगर
रवायतों का सिलसिला जुदा होगा ॥
हर काम को करते थे, कोई खेल हो जैसे ?
इतना तर्जुबेकार कोई और क्या होगा।।
कैसे सिखाते हैं किसी नौसीखिए को काम ?
ये हुनर हर किसी में भला आम क्या होगा?
आना बड़ा मुश्किल है जब इस नौकरी में तो
बेदाग निकलना भी तो आसान ना होगा ॥
तेरे साथ बिताया हर एक लम्हा संजोया है
क्या करते थे हम साथ तुम्हे याद ही होगा।।
जब भी चलेगा अच्छे ! किसी आदमी का जिक्र
उन महफिलों में जिक्र तेरा नाम भी होगा ॥
॥ आखिर इलाहाबादी ॥