चाहतों की महफ़िलों का
अब किनारा न रहा
दोस्तों की दोस्ती का
अब सहारा न रहा
मंजिलों और महफ़िलों की
आस थी दिल में मगर
तेरे इश्क में ज़ालिम
ये दिल हमारा न रहा||
उम्मीद का दामन हमेशा
हमने था रखा
तुझसे दूर रह के भी
तुझे पाने की थी इच्छा
तेरे इश्क का जूनून
ही कहूँगा मैं इसे
मझधार में था मैं पर
साहिल पे जा उतरा ||
आशिक थे हुस्न के
ज़ालिम कभी हम भी
इस बाग़ की आबो हवा के
शक्स थे हम भी
अब प्यार से रिश्ता
न रहा है ज़रा हमे
वरना तेरी अदा के
कदरदान थे हम भी||
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
तेरे बिन
हर शाम दिल में तन्हाई थी
मन तो खुश था मगर
दिल में एक उदासी सी छाई थी
जाने कितने दिनों पर
चली वो पुरवाई थी
न जाने कितनी मुद्दतो क बाद
याद तुझे मेरी आई थी|
न जाने कब से था
दिल को इंतज़ार तेरा
हर दिन रहता ये बेचैन
हर पल बेक़रार बड़ा
भंवरे का गुंजन था नीरस
फूलों में ज़हर भरा |
पर तुझे याद कर गुजारे थे
ये दिन और ये रात
और तेरी याद में बीते
न जाने कितने बरसात
पर तेरी खबर न आई
फिर भी था एक विश्वास
तुझसे मिलने की थी
मेरे होठों पे अधूरी प्यास |
पर उस विश्वास से भी
नाता टूट गया था
जब से हिचकियो ने भी मेरा दामन
छोड़ दिया था ||
पर आज एक उम्मीद की किरण
फिर से जग आई है
आज फिर से मुझे
हिचकियाँ आई है
आज मन भी खुश है मेरा
और दिल में बजी शहनाई है
भवरों को गुंजन में मिठास
और फूलों में खुशबु भर आई है
ऐसा लगता है जीवन में मेरे
खुशियाँ फिर से भर आई है
और आज ऐसा लगता है ज़ालिम कि
फिर से तुझे मेरी याद आई है |||
मन तो खुश था मगर
दिल में एक उदासी सी छाई थी
जाने कितने दिनों पर
चली वो पुरवाई थी
न जाने कितनी मुद्दतो क बाद
याद तुझे मेरी आई थी|
न जाने कब से था
दिल को इंतज़ार तेरा
हर दिन रहता ये बेचैन
हर पल बेक़रार बड़ा
भंवरे का गुंजन था नीरस
फूलों में ज़हर भरा |
पर तुझे याद कर गुजारे थे
ये दिन और ये रात
और तेरी याद में बीते
न जाने कितने बरसात
पर तेरी खबर न आई
फिर भी था एक विश्वास
तुझसे मिलने की थी
मेरे होठों पे अधूरी प्यास |
पर उस विश्वास से भी
नाता टूट गया था
जब से हिचकियो ने भी मेरा दामन
छोड़ दिया था ||
पर आज एक उम्मीद की किरण
फिर से जग आई है
आज फिर से मुझे
हिचकियाँ आई है
आज मन भी खुश है मेरा
और दिल में बजी शहनाई है
भवरों को गुंजन में मिठास
और फूलों में खुशबु भर आई है
ऐसा लगता है जीवन में मेरे
खुशियाँ फिर से भर आई है
और आज ऐसा लगता है ज़ालिम कि
फिर से तुझे मेरी याद आई है |||
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
JANMDIN....:)...:(
जन्मदिन
सोंचता था हूँ ज़रा शरीफ
नहीं होगी इतनी तकलीफ
पर ये भ्रम मेरा तोडा
सब ने मुझे ऐसा फोड़ा
फितरत थी उनकी कुछ अजीब
बचा न पाया मैं अपनी तशरीफ़
अब न उठता हु न बैठता हूँ
ऐसे ही घूमता हूँ
हर पल एक दर्द महसूस करता हूँ
जब उस रात को याद करता हूँ
जब मनाया था मैंने
अपने जन्मदिन का त्यौहार
हॉस्टल में पहली बार |
जब धोया था लोगों ने मुझे समझ के बेकार
याद आते ही हो जाता हु मैं बेक़रार
भगवान् न करे
दुबारा आये ये जन्मदिन का त्यौहार
न सोमवार न शुक्रवार न रविवार
क्यूंकि जब बी आएगा
तो कराएगा मुझे एक दर्द का एहसास
जिससे झूझते हुए
न जाने कैसे बीती थी वो सुहानी रात |||
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
बुधवार, 21 जुलाई 2010
ज़िन्दगी
चार पल की ये कहानी है हमारी ज़िन्दगी
उड़ता बादल बहता पानी है हमारी ज़िन्दगी
चाहतो का है भरा सैलाब हर एक पल यहाँ
जी लो जी भर के सुहानी है बड़ी ये ज़िन्दगी |
गुनगुनाते पक्षियों सा लहलहाते खेत सा
सरसराती पवन जैसा चिलचिलाती धूप सा
है कभी नदिया का पानी ,या कभी दरिया का जल
और कभी मरू का है बालू ,या कभी वृक्षों का फल
है असीमित राह इसमें है असीमित ख्वाहिशे
ख्वाहिशो को पूरा करके करलो ये जीवन सुखी
फिर लगेगी मोतियों क सेज जैसी ज़िन्दगी
जी लो जी भर के सुहानी है बड़ी ये ज़िन्दगी |
है कभी बारिश का पानी ,या कभी सुखी धरा
और कभी कड़वा करेला ,फिर कभी मीठा घड़ा
क्यूँ कभी हमको रुलाती ,क्यूँ कभी मायूस करती
फिर अचानक ख्वाहिशो को पूरा कर पल में हसाती
खिलखिलाती मुस्कुराती चाह्चाती ये रहे
हर एक पल इसके अनोखे ,हर एक पल इसके नए |
चाहता हु इस अनोखी ज़िन्दगी को कैद कर लू
पर कभी मुट्ठी में न आती हवा सी ज़िन्दगी |
मौत भी इसका ही पहलु जो छुपी रहती कही
लुक्का छुप्पी खेलते जिससे हर एक पल है सभी
पर किसी को ये न दिखती ,न कभी किसी ने सुनी
एक दिन इससे अचानक ही है मिलती ज़िन्दगी
उस समय न काम आता कोई रिश्ता न ही धन
मौत की आगोश में ऐसी तड़पती ज़िन्दगी |
मैं यही कहता हु यारो ज़िन्दगी रोमांच है
लुत्फ़ लो हर एक पल का अद्भुत मिला ये चांस है
प्यार से भर लो इसे नफरत के काबिल है नहीं
शिद्दतो से है मिली शायद मिले ये फिर नहीं |
|शशांक कुमार पाण्डेय |
उड़ता बादल बहता पानी है हमारी ज़िन्दगी
चाहतो का है भरा सैलाब हर एक पल यहाँ
जी लो जी भर के सुहानी है बड़ी ये ज़िन्दगी |
गुनगुनाते पक्षियों सा लहलहाते खेत सा
सरसराती पवन जैसा चिलचिलाती धूप सा
है कभी नदिया का पानी ,या कभी दरिया का जल
और कभी मरू का है बालू ,या कभी वृक्षों का फल
है असीमित राह इसमें है असीमित ख्वाहिशे
ख्वाहिशो को पूरा करके करलो ये जीवन सुखी
फिर लगेगी मोतियों क सेज जैसी ज़िन्दगी
जी लो जी भर के सुहानी है बड़ी ये ज़िन्दगी |
है कभी बारिश का पानी ,या कभी सुखी धरा
और कभी कड़वा करेला ,फिर कभी मीठा घड़ा
क्यूँ कभी हमको रुलाती ,क्यूँ कभी मायूस करती
फिर अचानक ख्वाहिशो को पूरा कर पल में हसाती
खिलखिलाती मुस्कुराती चाह्चाती ये रहे
हर एक पल इसके अनोखे ,हर एक पल इसके नए |
चाहता हु इस अनोखी ज़िन्दगी को कैद कर लू
पर कभी मुट्ठी में न आती हवा सी ज़िन्दगी |
मौत भी इसका ही पहलु जो छुपी रहती कही
लुक्का छुप्पी खेलते जिससे हर एक पल है सभी
पर किसी को ये न दिखती ,न कभी किसी ने सुनी
एक दिन इससे अचानक ही है मिलती ज़िन्दगी
उस समय न काम आता कोई रिश्ता न ही धन
मौत की आगोश में ऐसी तड़पती ज़िन्दगी |
मैं यही कहता हु यारो ज़िन्दगी रोमांच है
लुत्फ़ लो हर एक पल का अद्भुत मिला ये चांस है
प्यार से भर लो इसे नफरत के काबिल है नहीं
शिद्दतो से है मिली शायद मिले ये फिर नहीं |
|शशांक कुमार पाण्डेय |
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पहला प्रभाव
वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...
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एक उनकी ख्वाहिशों में हम जमाना भूल बैठे हैं मोहब्बत के सफर में हम ठिकाना भूल बैठे हैं।। जो उनके साथ बीते हैं वो लम्हे याद हैं अब भी बिना...
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जब से मिले हो तुम , सब बदल गया है जैसे कि अब जग झूठ और तेरा प्यार सच्चा लगता है और यूँ तो बहुत बड़बोले थे हम मगर अब चुप-चाप तेरे करीब रहन...