जिंदगी के गमों को कुछ ऐसे धो देते हैं
जब कभी खुश होते हैं रो देते हैं।।
ना पूछो कैसे बिताते हैं लम्हे उनके बगैर
जब उनकी याद आती है सो लेते हैं।।
।।आखिर।।
खुशनसीब हुँ शहीद हुआ सरहद पर
पर मेरी मौत को तुम ऐसे तो रुसवा ना करो।
ढूंढना बंद करो मेरे नाम में मजहब
मेरी मैयत पे तो तुम ऐसे सियासत ना करो।
नहीं है शौख मिले कोई पुरस्कार मुझे
ध्यान रखना मेरे घर में कभी आँसू ना गिरे।
कभी लौटाए ना पदक कोई मेरी खातिर
देखना देश मेरा ये असहिष्णु ना बने।।
मैं तो मर ही गया पर एक है ख्वाहिश "आखिर"
मेरे जैसा नहीं अगली दफा कोई भी मरे।।
।।आखिर।।
हम तेरी मोहब्बत में महसूस ये करते हैं
थे जिंदा अभी तक हम अब जिंदगी जीते हैं।।
ना जाने इन आँखों ने क्या जादू किया हम पर
हम भूल गए खुद को बस याद तू रहती है।।
हर रात तू आती है ख्वाबों में मेरे ऐसे
जैसे कोई शहज़ादी चंदा से उतरती है।।
ना जाने हुआ क्या है जब से हूँ मिला तुमसे
अब आप ही सर मेरा तेरे सजदे में झुकता है।।
तेरे प्यार ऐ साहिब ना जाने क्या जादू है
मेरी गज़लों में अब बरबस तेरा रूप झलकता है।।
जब से तुम्हें देखा है इन आँखों ने ऐ जानम
तब से इन आँखों को कोई और ना जचता है।।
ना जाने हुआ क्या है मेरी ख्वाहिशों को "आखिर"
तेरी ख्वाहिशों के आगे चुपचाप ये रहती हैं।।
।।आखिर।।
वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...