#अकेला_छोड़_आया_हूँ
बचपन के वो दिन जब हम ख़ुशी से झूमा करते थे
किसी काँधे पे चढ़ कर रोज़ मीलों घूमा करते थे
थी कुछ उँगलियाँ जिसने हमे चलना सिखाया था
गिरे जब भी सफर में हम तो एक आँचल का साया था
ना जाने क्यों ली करवट वक़्त ने यूँ दूर हम हुए
वो बातें अब फकत यादों सी हमको आ रुलाती है
मैं शर्मिंदा सा हो जाता हूँ उनका हाल-ए-दिल सुनकर
समय की दौड़ में जिनको अकेला छोड़ आया हूँ ॥
॥आखिर॥
बचपन के वो दिन जब हम ख़ुशी से झूमा करते थे
किसी काँधे पे चढ़ कर रोज़ मीलों घूमा करते थे
थी कुछ उँगलियाँ जिसने हमे चलना सिखाया था
गिरे जब भी सफर में हम तो एक आँचल का साया था
ना जाने क्यों ली करवट वक़्त ने यूँ दूर हम हुए
वो बातें अब फकत यादों सी हमको आ रुलाती है
मैं शर्मिंदा सा हो जाता हूँ उनका हाल-ए-दिल सुनकर
समय की दौड़ में जिनको अकेला छोड़ आया हूँ ॥
॥आखिर॥
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