बुधवार, 27 अगस्त 2014

आज मौसम ने करवट ली है कुछ

आज मौसम ने करवट ली है कुछ
हवाएँ भी भीगी-भागी सी लग रही है
एक टीस फिर से उठी है दिल में मेरे
तेरी आरज़ू फिर जागी-जागी सी लग रही है ॥

अब हर नज़ारे में मुझे तू ही दिखता है
मेरी सूरत भी अब तेरी परछाई सी लग रही है
तेरे नैन-नक्स के तो कई अफ़साने थे मगर
तेरी बातें भी अब रुबाई सी लग रही हैं ॥

आज आसमां भी तेरे रंग सा गुलाबी है
ये हवाएँ भी किसी शराबी सी लग रहीं हैं
इन घटाओं ने लिया है तेरी गेसुओं का रंग
ये बूँदें भी अब कुछ नवाबी सी लग रही हैं ॥

तेरे चेहरे का नूर लाजवाब है मगर
तेरी बिंदिया भी आज आफ्ताबी सी लग रही है
तेरी आखों का सुरमा , तेरे होठों की लाली
तू तारों से सजी शाहज़ादी सी लग रही है ॥

यूँ बन-संवर के आई है तू मेरी दुनिया में
तू मेरे ख़्वाबों की सच्चाई सी लग रही है
और मेरी कैफियत का अंदाज़ा नहीं है तुझे "आखिर"
किस कदर मेरी साँसें आज इन्कलाबी सी लग रहीं हैं ॥

॥आखिर॥

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