रविवार, 27 जुलाई 2014

ऐ-खुद क्या वक़्त तूने अब दिखाया है
मेरी चौखट पे मेरी मन्नतों को लेकर आया है ॥

वो एक ख्वाहिश मेरे दिल की जो बरसों से अधूरी थी
सताकर मुझको इतना अब मुझे उस से मिलाया है ॥

मेरी आँखों में आंसू है तो ये दिल खुश भी है बड़ा
के रागों का अजब संगम मेरे मन पे यूँ छाया है ॥

और बद्नसीबियों के दौर से शिकवा नहीं है अब
कि खुशनसीबी ने मुझे अपने बनाया है ॥

कैसे करेगा शुक्रिया "आखिर" , मेरे मुर्शिद
दुआ मेरी कुबूली है , ये सर सिजदे झुकाया है ॥

है ये सुरुआत बस इसको समझना अंत न हमदम
अभी तो वक़्त है, मेरा भी सूरज जगमगाएगा ॥

॥आखिर॥ 

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