तू थी खुशबु के जैसी हवा में घुली
मैं तो भंवरे सा दर-दर भटकता रहा
चाहतो में तेरी डूबा कुछ इस कदर
तू थी मृगतृष्णा ये मैं समझ न सका
ढूंढते-ढूंढते वक़्त बहता गया
तेरी हसरत भी हर लम्हा बढ़ती गयी
अब उम्र जो ढली तो पता ये चला
मैं तेरे बिन न एक डग कभी था चला ॥
मैं तो भंवरे सा दर-दर भटकता रहा
चाहतो में तेरी डूबा कुछ इस कदर
तू थी मृगतृष्णा ये मैं समझ न सका
ढूंढते-ढूंढते वक़्त बहता गया
तेरी हसरत भी हर लम्हा बढ़ती गयी
अब उम्र जो ढली तो पता ये चला
मैं तेरे बिन न एक डग कभी था चला ॥
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