बहुत खुदगर्ज होती जात है इन हुक्मरानों की
बमुश्किल ही किसी मसले पर इनको दर्द होता है
लहू बहता है सीमा पर जवानों का तो बहने दो
इन्हे कुर्सी से मतलब है सियासत फ़र्ज़ होता है ॥
वो एक निर्जीव सी गोली भी मज़हब भूल जाती है
जब भी चलती है सरहद का सीना छील जाती है
हसूँ बुद्धि पर मैं इनकी या दू दाद ए "आखिर"
जो जाकर के शहीदो में भी मज़हब ढूंढ लाती है
चुनावों का महीना जब कभी आता है दिल्ली में
ये हिन्दू ढूंढ लाती है , ये मुस्लिम ढूंढ लाती है ॥
॥आखिर॥
बमुश्किल ही किसी मसले पर इनको दर्द होता है
लहू बहता है सीमा पर जवानों का तो बहने दो
इन्हे कुर्सी से मतलब है सियासत फ़र्ज़ होता है ॥
वो एक निर्जीव सी गोली भी मज़हब भूल जाती है
जब भी चलती है सरहद का सीना छील जाती है
हसूँ बुद्धि पर मैं इनकी या दू दाद ए "आखिर"
जो जाकर के शहीदो में भी मज़हब ढूंढ लाती है
चुनावों का महीना जब कभी आता है दिल्ली में
ये हिन्दू ढूंढ लाती है , ये मुस्लिम ढूंढ लाती है ॥
॥आखिर॥
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