शनिवार, 6 दिसंबर 2014

बहुत खुदगर्ज होती जात है इन हुक्मरानों की
बमुश्किल ही किसी मसले पर इनको दर्द होता है
लहू बहता है सीमा पर जवानों का तो बहने दो
इन्हे कुर्सी से मतलब है सियासत फ़र्ज़ होता है ॥

वो एक निर्जीव सी गोली भी मज़हब भूल जाती है
जब भी चलती है सरहद का सीना छील जाती है
हसूँ बुद्धि पर मैं इनकी या दू दाद ए "आखिर"
जो जाकर के शहीदो में भी मज़हब ढूंढ लाती है
चुनावों का महीना जब कभी आता है दिल्ली में
ये हिन्दू ढूंढ लाती है , ये मुस्लिम ढूंढ लाती है ॥

॥आखिर॥ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...