गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

ज़मीं का एक टुकड़ा जो हमे बुद्धू बनता है
कभी मुस्लिम बनता है कभी हिन्दू बनता है ॥
इक उसके मोह में फंस कर प्रभु का नाम लेकर के
कोई मंदिर गिरता है कोई मस्जिद गिरता है ॥
नहीं मिलना है तुझको कुछ नहीं मिलना मुझे कुछ भी
ये टुकड़ा सिर्फ हमको खून का प्यास बनाता है ॥
बहाकर के लहू मासूमों का इस व्यर्थ की ज़िद में
ये टुकड़ा एक ज़ालिम को यहाँ नेता बनता है ॥

॥आखिर॥

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