मंगलवार, 2 सितंबर 2014

तेरे ही हम दीवाने हैं!!

गया है दूर जब से तू मेरी आँखों में पानी है
मगर फिर भी ख्यालों में तेरे ही हम दीवाने हैं ॥

तुझे ही ढूंढते हैं हम जहाँ के आशियानों में
कभी सुबह को देवालय तो शामों को मैखाने में
मगर मिलता नहीं जब तू उदासी दिल पे छाती है
छलकते हैं मेरे आंसू हर एक ही शामियाने में
तुझे जब भूलना चाहूँ तो बस ये याद आता है
के दें कैसे भुला उसको के जिसके हम दीवाने हैं ॥

चढ़ा है रंग जो तेरा उतरता क्यों नहीं आखिर
भले धो लूँ मैं खुद को जाके गंगा के मुहाने में
किये थे अनगिनत वादे रहेंगें साथ जीवन भर
मगर अब ढूंढता तुझको हूँ मैं इन चाँद तारों में
मुझे मालूम मिलना अब दोबारा है नहीं मुमकिन
मगर फिर भी तेरी ख्वाहिश में डूबे हम दीवाने हैं ॥

तेरे संग-संग चले जिन राहों पर सब याद है मुझको
मगर डरता हूँ उन गलियों को फिर से आज़माने में
मेरा मकसद नहीं खुद को परेशान मैं करूँ लेकिन
बहुत मज़बूर हूँ इस आशिकी को आज़माने में
चढ़ी तेरी खुमारी है उतरती ये नहीं "आखिर"
तुझे ही प्यार करते हैं तेरे ही हम दीवाने हैं ॥

॥आखिर॥ 

2 टिप्‍पणियां:

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