मंगलवार, 30 सितंबर 2014

भूल जाता हूँ

तुझे मैं देखता हूँ और सब कुछ भूल जाता हूँ
के हूँ कौन मैं ये बात अक्सर भूल जाता हूँ ॥

ये तेरी अदाओं का जादू 'काला' ही तो है कि
इनमे फंस कर मैं दुआओं का असर भूल जाता हूँ ॥

ये तेरी कजरारी काली जो झील सी आँखें हैं
मैं इनमे डूबकर हर एक मंज़र भूल जाता हूँ ॥

तेरा ये खुशनुमा चेहरा तेरी ये मीठी सी बातें
मैं इनमे डूबकर सारे ग़मों को भूल जाता हूँ ॥

तेरे गेसुओं की काली घनी छाँव में आकर
मैं चिलचिलाती धूप का असर भूल जाता हूँ ॥

अँधेरी रात के साये में चमचम करती ये बिंदी
मैं इसकी जगमगाहट में सितारे भूल जाता हूँ ॥

तेरा यौवन की जिसने कल ही अठरह साल देखा है
मैं उसके एक नज़ारे पे 'नज़ारे' भूल जाता हूँ ॥

बड़ी फुरसत से उस रब ने उकेरा है तेरे तन को
तेरे आगे मैं खजुराहो की मूरत भूल जाता हूँ ॥

॥आखिर॥

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...