कुछ बातें थी जो अपनी वो बातें पीछे छूट गईं
खट्टी मीठी आवाजों की बस यादें हममे छूट गईं
तुमसे न बिच्चादने की चाहत हर लम्हा दिल बसी रही
जीवन क कटीं संगर्ष में अब तेरी आहात पीछे छूट गईं ||
वो काली काली सी आखें जो हमसे बातें करती थीं
जब चले प्रेम की पुरवाई ख़ामोशी बातें करती थीं
कुछ न कह कर सब कहती थीं जब हमसे रूठा करतीं थीं
वो प्यार भरी वो मस्तानी जो रातें थीं वो छूट गईं ||
जब यारों का था संग हमे ख़ामोशी हमसे डरती थी
खुशियाँ रहती हर दिल में तब आखें न किसी की रोतीं थीं
चुप कभी नहीं रहता था मैं प्रेषण सभी को करता था
वो चिल्लाने वो गुर्राने की आदत थी वो छूट गई ||
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