ना जाओ उस ओर जिधर
एक भीड़ चली जाती सी दिखे
ना जाओ उस छोर जिधर
एक राह सरल सीधी सी दिखे
पथिक चलो उस ओर जिधर
हो कांटे तेरे पथ में बिछे
लहू-लुहान हो मार्ग तेरा
बस कुछ ही लोग खड़े हो दिखे
सच्चाई का पथ है उसपर
ले सबका आशीष चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर सच कि राह चलो॥
दम्भ भरो न तुम
अपनी जाती का न अभिमान करो
करम धर्म के नाम पे ना
एक दूजे का अपमान करो
सम्प्रदाय कि आग
ना जाने कितने घर को निगल गयी
न हो कोई अब अनाथ
कुछ इनका समाधान कारो
भाईचारा बढे देश में
ये प्रण लेकर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल कर प्रेम कि राह चलो ॥
होड़ लगी है न जाने क्यूँ
पैसा खूब कमाने की
जिस पथ से हो जैसे भी हो
अपना काम बनाने कीं
इस चक्कर में हम सब भैया
भ्रष्ट राह पर चले गए
अब कोशिश करनी है इनको
फिर सुमार्ग पर लाने कि
स्वाभिमान से करें काम हम
ये संकल्प ले आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल ईमान कि राह चलो ॥
हमने जिनको सदियों पूजा
वो शक्ति है नारी है
आज वही नारी है शोषित
पीड़ित है बेचारी है
ना जाने क्या हुआ हमे कि
हर नर अब व्यभिचारी है
ऐसा लगता है अपनी
सभ्यता पतन कि बारी है
दूर करें इन विकृतियों को
ये कोशिश कर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
तुम सदाचार कि राह चलो ॥
आज हमारे देश में
टोपी कि एक लहर सी छाई है
जिसको देखो टोपी पहने कहता
ये दल भाई है
ये है सच्चा सही वही
ये नारी का रखवाला है
इसके आगे चलने से
ये देश बदलने वाला है
आखिर कहता मत बांधो तुम
खुद को "टोपी-जालों" में
नाम करो न तुम अपना
एक दल को चाहने वालों में
लेकिन तुम ये करो प्रतिज्ञा
अपना फ़र्ज़ निभाओगे
हर एक अत्याचारी को तुम
अब चुनाव हरवाओगे
कि न पंहुचे कोई चोर उचक्का
संसद में ले ये काम चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर देश कि राह चलो ॥
||शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर'||
एक भीड़ चली जाती सी दिखे
ना जाओ उस छोर जिधर
एक राह सरल सीधी सी दिखे
पथिक चलो उस ओर जिधर
हो कांटे तेरे पथ में बिछे
लहू-लुहान हो मार्ग तेरा
बस कुछ ही लोग खड़े हो दिखे
सच्चाई का पथ है उसपर
ले सबका आशीष चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर सच कि राह चलो॥
दम्भ भरो न तुम
अपनी जाती का न अभिमान करो
करम धर्म के नाम पे ना
एक दूजे का अपमान करो
सम्प्रदाय कि आग
ना जाने कितने घर को निगल गयी
न हो कोई अब अनाथ
कुछ इनका समाधान कारो
भाईचारा बढे देश में
ये प्रण लेकर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल कर प्रेम कि राह चलो ॥
होड़ लगी है न जाने क्यूँ
पैसा खूब कमाने की
जिस पथ से हो जैसे भी हो
अपना काम बनाने कीं
इस चक्कर में हम सब भैया
भ्रष्ट राह पर चले गए
अब कोशिश करनी है इनको
फिर सुमार्ग पर लाने कि
स्वाभिमान से करें काम हम
ये संकल्प ले आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल ईमान कि राह चलो ॥
हमने जिनको सदियों पूजा
वो शक्ति है नारी है
आज वही नारी है शोषित
पीड़ित है बेचारी है
ना जाने क्या हुआ हमे कि
हर नर अब व्यभिचारी है
ऐसा लगता है अपनी
सभ्यता पतन कि बारी है
दूर करें इन विकृतियों को
ये कोशिश कर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
तुम सदाचार कि राह चलो ॥
आज हमारे देश में
टोपी कि एक लहर सी छाई है
जिसको देखो टोपी पहने कहता
ये दल भाई है
ये है सच्चा सही वही
ये नारी का रखवाला है
इसके आगे चलने से
ये देश बदलने वाला है
आखिर कहता मत बांधो तुम
खुद को "टोपी-जालों" में
नाम करो न तुम अपना
एक दल को चाहने वालों में
लेकिन तुम ये करो प्रतिज्ञा
अपना फ़र्ज़ निभाओगे
हर एक अत्याचारी को तुम
अब चुनाव हरवाओगे
कि न पंहुचे कोई चोर उचक्का
संसद में ले ये काम चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर देश कि राह चलो ॥
||शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर'||
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