गुरुवार, 5 नवंबर 2015

लोकतंत्र ही आफत है।।

कितना अच्छा देश है मेरा, उफ़ कैसी ये सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

हम जीते स्वछंद पवन में एक दूजे का साथ लिए
हम जीते अपनी मर्जी से जीने का अधिकार लिए
वो अधिकार जिसे हम सब में संविधान ने बाँटा है
वो अधिकार कि जिनके कारण भारत भाग्य विधाता है
पर ना जाने क्यों आपस में हम टकराये रहते हैं
हर लम्हा हम क्यों एक दूजे पर गुर्राये रहते हैं
लगता है हमको बहका के करता कोई सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

कहने को आजाद हैं हम जाने कैसी आजादी है
हर चौराहे हर नुक्कड़ पर जीवन की बर्बादी है
तीखी धूप भले हो कितनी या कितनी ही ठंड पड़े
जलते बुझते से इंसान दिख जाते हैं सड़कों पर पड़े
जिनकी हालत से अच्छी सड़कों की हालत लगती है
जिनमें कोई छेद हुआ तो सरकार मरम्मत करती है
इंसानों का मोल गिराती सरकारें या सियासत है ?
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

यूँ तो भारत में रहने वाले सब एक समान हैं
कोई छोटा है ना बड़ा जब तक ये हिंदुस्तान है
पर ये सब कहने की बातें असल अलग कुछ होता है
भारत में तो सबसे उपर केवल नेता होता है
जिनको चुन कर के संसद में हमने भेजा होता है
और जब उनकी पड़े जरूरत तभी नदारद होता है
पाँच साल तक भारत पर वो करता यूँ मनमानी है
भारत उसके पुरखों की जागीर दिखाई देता है
संसद में भेजे सेवक को राजा करती सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

।।आखिर।।

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