सोमवार, 24 नवंबर 2014

जब से देखा तुझे

जब से देखा तुझे मैं भूल गया हूँ खुद को
देखा है सिर्फ तेरा ख्वाब है चाहा तुझको
एक तेरा साथ मिले मुझको हर कदम इसकर
लाखों सजदे किये दुआ में माँगा है तुझको ॥

तू जो होता नहीं तो जैसे ख़ुशी रूठ जाती है
होठों पे आते-आते हमसे हंसी रूठ जाती है
यूँ न छुप कर के हमे और सता ए हमदम
तेरे मुखड़ा जो ना देखूं तो दुआ रूठ जाती है ॥

चाँद से जब कभी होती है गुफ्तगू अपनी
तेरी बातों में जाने रात कैसे बीत जाती है
तेरी हरकत पे अगर चाँद कभी हँसता है
चांदनी चाँद से झुंझला के रूठ जाती है ॥

जब से देखा है मैंने खुद को तेरी आँखों में
रात भर अब मुझे ये नींद कहाँ आती है
हर घडी बस यही मैं सोचता हूँ क्यों आखिर?
तू नहीं आती है पर याद तेरी आती है ॥

खैर अंजाम जो भी हो इस सफर का अब
संग तेरे चलने में थकान कहाँ आती है
एक तेरा ही मिले साथ हर जनम "आखिर"
तेरी बाँहों के सिवा नींद कहाँ आती है ॥

॥आखिर॥ 

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