खामोश क्यों खड़ा है दिल , कुछ खुराफात कर
यूँ बैठने से होगा क्या , तु दिन को रात कर
आया है नज़र मुद्दतों मे , ईद का वो चांद
घुल जाए बाहों मे तेरी , कुछ तो फिराक़ कर ॥
बस देखता रहेगा क्या , कुछ बोल तो जरा
आँखों से बात कि बहुत , लब खोल तो जरा
वो भी बनेगा हमसफ़र , हर रात का तेरे
तू राज़ अपने दिल का , कभी खोल तो जरा ॥
॥आखिर॥
यूँ बैठने से होगा क्या , तु दिन को रात कर
आया है नज़र मुद्दतों मे , ईद का वो चांद
घुल जाए बाहों मे तेरी , कुछ तो फिराक़ कर ॥
बस देखता रहेगा क्या , कुछ बोल तो जरा
आँखों से बात कि बहुत , लब खोल तो जरा
वो भी बनेगा हमसफ़र , हर रात का तेरे
तू राज़ अपने दिल का , कभी खोल तो जरा ॥
॥आखिर॥
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