सोमवार, 21 अप्रैल 2014

देखने को नए मंज़र मिले

हम अपने घर से निकल एक शहर गए
तो बदले हुए हमे हर मंज़र मिले
एक संगम छोड़ा था हमने घर पर
वहाँ पहुचे तो समंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥

ज़िन्दगी तो वही थी पर रफ़्तार तेज़ थी
आदमी की आदमी पर मार तेज़ थी
कुछ झाँका करती थी लोकल से लटक कर
तो कुछ के हाथों में कार तेज़ थी ,
मेरे घर में तो अब भी बग्गियां चलती हैं
पर वहां लोग गाड़ियों के अंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥

घर थे कुछ अपने जैसे पर ऊँची उनकी काया थी
जिनमे रहना और नहीं कुछ बस पैसों की माया थी
वहीँ बगल में पड़ी सड़क पर कई ज़िन्दगी रोती थी
न सर पे थी छत उसके और न खाने को रोटी थी ,
मेरे घर में तो अब भी छत मिल जाती है गरीबों को
पर वहां वो मलिन बस्तियों के अंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥

ना जाने क्या था पानी में , बच्चा "बच्चा" लगा नहीं
सारी हरकत परिपक्वा सी कोई कच्चा लगा नहीं
वो विद्यालय के कपड़ों में रोज़ घरों से निकलते थे
शाम किसी का हाथ वो पकडे चौपाटी पर मिलते थे ,
मेरे घर में तो अब भी कुछ लडकपन है बच्चो में
पर वहां वो प्रेम के अंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥  

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