निगाहों में तेरी चाहत के नगमे यूँ भरे कबसे
जो आयीं बारिशों की रुत तुझे सुनने को ये तरसें
तेरी पायल की रुन-झुन जब कभी इस दिल में बजती है
तेरे इक दर्श को आँखें मेरी कुछ यूँ तरसती है
की आ भी जा मेरे हमदम अगर चाहत है कुछ मुझसे
किन बिन मौसम भी ये आँखें मेरी ऐसे बरसती है
नज़ारा देख कर के लोग बस ये बात कहते हैं
की शम्मा आज भी कातिल है बस परवाने जलते हैं ||
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