मैं रोता हूँ , तू हंसाती है
मैं हँसता हूँ , तू रुलाती है
मैं सुनता हूँ , तू सुनती है
मैं रुकता हूँ , तू चलती है
न जाने कैसी है तू ऐ ज़िन्दगी
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।
कभी तो सुन क्या हसरतें है मेरी
कभी तो कर जो फितरतें हैं मेरी
कभी तो कह जो सुनना चाहूँ मैं
कुछ तो कर ऐसा कि खुश हो जाऊं मैं
पर तू हर पल मुझसे अपनी ही बात मानवाती है
न जाने कैसी है तू ऐ ज़िन्दगी
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।
जो जीना चाहे उसे मौत दे जाती है
किसी से मरते हुए दिन बितवाती है
कहीं खुशियों की चाँदनी बिखेरी है तूने तो
कहीं घनघोर अन्धकार छोड़ जाती है
न जाने कैसी है तू ऐ ज़िन्दगी
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।
मैं तो कवी हूँ ज़माने की बातें करता हूँ
कभी नज़ारे तो कभी फ़साने की बातें करता हूँ
अपनी अभिव्यक्ति से दिल-मिलाने की बात करता हूँ
पर तू मेरी भी कलाम से अपना गुणगान करवाती है
न जाने कैसी है तू ऐ ज़िन्दगी
अपने ही धुन में चलती जाती है ।।
--->शशांक कुमार पाण्डेय <--- p="p">--->
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