मंगलवार, 20 सितंबर 2011

क्यूँ

क्यूँ भीड़ में भी हर पल एक अजीब सी तन्हाई है

दिलो दिमाग पर मेरे एक उदासी छाई है

क्यूँ सुनने लगा हु आज कल मैं अपनी ही धडकनों का शोर

क्या यूँही चलती प्यार की पहली पुरवाई है |||

क्यूँ तेरे तस्सवुर में डूबी रहती है तनहा मेरी हर रातें

क्यूँ में अकेले में करता हूँ खुद से इतनी सारी बातें

क्या हो रहा है मुझको मुमकिन नहीं है बताना की

क्यूँ रह रह के याद आती है तेरी मेरी वो हसीं मुलाकातें ||

क्यूँ हर रंग रूप में मुझे बस तेरा ही अक्स दिखता है

क्यूँ इन वादियों इन फिजाओं में छाया तेरा ही नूर लगता है

बेशक जो हाल है मेरे दिल का वो मेरा कसूर है लेकिन

क्यूँ कल तक ये दिल जो मेरा था आज वो तेरा लगता है||

क्यूँ तुमसे इतना प्यार हुआ की खुद से बेवफा बन गए

क्यूँ हर चीज़ थी मेरे पास पर तुम दर्दे जिगर दे गए

क्यूँ बेखुदी तेरे प्यार की छाई है मुझे पे इस तरह

की तेरी चाहत में हम खुद को फ़ना कर गए ||

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