मंगलवार, 22 सितंबर 2015

जाने कब?

इस दुनिया की भाग दौड़ से मिलेगी फुर्सत जाने कब?
जाने कब आराम करूँगा आँख लगेगी जाने कब?

हर पल पैसे के पीछे बस भाग रहा है क्यों इंसान
न जाने कैसी तृष्णा ये भूख मिटेगी जाने कब ?

एक दूजे के खून का प्यासा जाने क्यों है अब इंसान
न जाने कैसे फैला ये द्वेष मिटेगा जाने कब ?

नहीं बोलता है इंसान अब कुछ भी अत्याचार पर
जागती आखें पर सोया इंसान उठेगा जाने कब?

कोई भी अब मदद न करता भूखे की लाचार की
बन गए है अब सब मुरीद बस मिथ्या के व्यापार की
अब सब को एक बड़ी सी गाड़ी,बंगला ,पैसा चाहिए
अब परवाह करता ही कौन है इस अदने से "प्यार" की
"सेवा परमो धर्मः" का जो गीता में था ज्ञान मिला
उसको अपना करके हम इंसान बनेंगे जाने कब ?

"आखिर" बस ख्वाहिश करता है ऐसे एक जहान की 
जहाँ ना हो कोई धर्म न जाती कीमत हो इंसान की 
जहाँ ना हो कोई बेबस न कोई भूखा रहे निवालों को 
जहाँ बसे बस प्यार दिलों में खुशियाँ हो रुखसारों पर 
जहाँ हर एक व्यक्ति के दिल में सेवाभाव की सोच बसे 
रामराज्य के जैसा मेरा देश बनेगा जाने कब?

॥आखिर॥ 

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