बुधवार, 3 जून 2015

हर कोई अब सो रहा है?

ज़िन्दगी को आदमी ना जाने कैसे जी रहा है
कोई रोता हंस रहा है कोई हँसता रो रहा है
कोई तडपे या मरे किसको फ़िक्र इस बात की
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

आदमी ही आदमी को हर कदम है काटता
आदमी ही आदमी पर चढ़ दिशाएं नापता
दूसरों को रख के भूखा चैन से कोई जी रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

बांटते है खुद को हम जाती-धरम के नाम पर
काटते है खुद को हम धर्मों-करम के नाम पर
खून से लथपथ ज़मीं पर खुशियां कोई बो रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

हर सुबह उठता हूँ मैं अल्लाह-प्रभु के नाम पर
कुछ कदम चलता हूँ मैं एक उसकी उंगली थाम कर
रहने को महले-दुमहले दिखते हैं हर मोड़ पर
और बगल दिखता है जीवन धूप में तपते हुए
आते जाते हर कोई उसको है ऐसे देखता
जैसे के वो सिर्फ एक पत्थर पड़ा हो राह पर
देखकर इन दृश्यों को ऐसा है लगता ए-खुदा
रेत पर लिख कर तू "इंसान" लहरों से अब धो रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

॥आखिर॥ 

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