शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

मोहब्बत में ज़रा सा आज खुद को आज़माने दे

मोहब्बत में ज़रा सा आज खुद को आज़माने दे
तेरे दिल में मुझे भी एक छोटा घर बनाने दे ॥

तेरी मुस्कान मेरे होठो की मुस्कान बन जाए
तेरी आँखों के आंसू को मेरी पलकों पे आने दे ॥

बहुत अच्छा है लगता चाँद तारों में सजा लेकिन
इसे एक दिन की खातिर मेरे आँगन को सजाने दे ॥

जो जलते हैं दिए हर शाम तन्हाई के आलम में
तेरी मौजूदगी में इनको धीरे से बुझाने दे ॥

मोहब्बत के कई अफ़साने हमने थे सुने अब तो
हमे भी बन के राँझा कोई अफ़साना बनाने दे ॥

अभी तक काफिरों सा दर-बदर भटका था मैं 'आखिर'
मोहब्बत को मेरा ईमान तुझको रब बनाने दे ॥

||आखिर||


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