शनिवार, 14 जुलाई 2012

कल और अब

ये मौसम ये रुत और ये तनहा सा आलम 
तेरी याद बस मुझको आने लगी है 
जो बातें कभी करती थी हमको घायल 
वो बातें ही अब तो सताने लगीं है
तेरी याद बस मुझको आने लगी है ||

निगाहों में थे जो भी चाहत के नगमे 
वो नासूर बन कर डराने लगीं  हैं  
थी आँखों की नदियाँ जो बरसों से सूखी 
वो बिन मौसम बरसात लाने लगीं हैं  
तेरी याद बस मुझको आने लगी है ||

जो रहते थे बस तेरी आँखों में डूबे 
तेरी एक झलक को बेगाने हुए हैं 
शराबों से जो हर पल करते थे तौबा 
शराबों में अब वो नहाने लगे हैं
नजारों को अब तक तो ढूँढा था तुझमे 
अब तुझको नजारों में पाने लगे है
ये मौसम ये रुत और ये तनहा सा आलम 
तेरी याद बस मुझको आने लगी है ||

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पहला प्रभाव

वो जो आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं बहुत दूर हैं शायद , सारे टिमटिमा रहे हैं ॥ कल तक जो दिखते ना थे अंदर से वो जुगनू आज सारे जगमगा रहे हैं ...